पल भर में कभी कुछ दिनों के फासले में
कोई ख़ास बन जाता है
कल तक जो दबा सा था हसरत में
वही रूमानी एहसास बन जाता है
लिख लिख कर जिनकी याद में
मेरी कलम की स्याही सूख गई
जिनके जाने से मेरी बंधी हुई
सारी उम्मीदें टूट गईं
वो अपना ही जब अनजाना
सरेआम हुआ जाता है
तो किस अदालत में
रखूँ मैं अपनी दलील
हर मुंसिफ उनका दीवाना हुआ जाता है.
कुछ दिनों की ही तो बात है
मुझे इबादत का जूनून चढ़ आया था
खुदा को ढूँढने निकला मैं जो
तो तेरे दर पर कुछ पल ठहर आया था
एक वो दिन था और आज है
मेरी छूटी न तब से कोई नमाज़ है
वो सुर्ख लाल सा चेहरा तेरा
ये हया है तेरी या बेकद्री मेरी
कुछ समझ में नहीं आता
आखिर मेरी दुआओं का
कोई जवाब क्यों नहीं आता

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