इतना आज वक्त नहीं

– अशान्त ·

– Ashant ·

· in

दूसरों के लिए सोचें ज़रा
इतना आज वक्त नहीं
दिल से रो और हँस सके
इतना आज वक्त नहीं
दूसरों को दिखाने से फुर्सत कहाँ
कुछ सच्चा सोचने का वक्त नहीं
जिस्म के आगे बढ़ सकें हम
इतना आज वक्त नहीं
आँसू बहता है तो बहने दें
रूमाल देने का आज वक्त नहीं
दोस्ती जरिया काम बनाने का
दोस्ती के जज्बे का वक्त नहीं
पैसे की अहमियत बढ़ी इस कदर
घर की मिठाई का आज वक्त नहीं
रिक्शे पर बैठते हैं चढ़ कर
पैदल चलने का वक्त नहीं
‘मैं’ कुछ इतना बड़ा हो गया
‘हम’ का आज वक्त नहीं
दो मिनट में हो जाती है बातें
चिट्ठी लिखने का वक्त नहीं
उल्फत रसूख का जरिया है
सच्ची मोहब्बत का वक्त नहीं
मन ही रख सकता है अशांत
चैन से सोचने का वक्त नहीं।
अशांत

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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