इस जहाँ में हमने सुना है
इबादत का कुछ ऐसा ही दस्तूर है
इंसानों का मोल कुछ नहीं
पर पत्थरों का मोल ज़रूर है।
इबादत मैंने भी की थी किसी की
वो जो शायद जहाँ में सबसे पाक था
पर उस खुदा ने भी धोखा ही दिया
मैंने सजदा छोड़ा तो फ़िर बुरा क्या किया?
अशांत
इस जहाँ में हमने सुना है
इबादत का कुछ ऐसा ही दस्तूर है
इंसानों का मोल कुछ नहीं
पर पत्थरों का मोल ज़रूर है।
इबादत मैंने भी की थी किसी की
वो जो शायद जहाँ में सबसे पाक था
पर उस खुदा ने भी धोखा ही दिया
मैंने सजदा छोड़ा तो फ़िर बुरा क्या किया?
अशांत

– अशान्त
– Ashant
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