मैं अपनी मोहब्बत नीलाम कर आया
बहुत दिनों से जान अटकी थी
कत्ल आज सरेशाम कर आया
ऐ खुदा तेरा बंद हूँ मैं
काफिरों सा काम आज कर आया।
मैं अपनी मोहब्बत नीलाम कर आया
दर्द सालता है आज तक मुझको
न मिला इलाज हर हकीम दिखा आया
ऐ खुदा बता दे खता मेरी
पिछला कौन सा बुरा काम कर आया।
मैं अपनी मोहब्बत नीलाम कर आया
कुछ निशानियाँ जो अब तक पास हैं
चाह कर भी उन्हें ख़ुद से अलग नही कर पाया
ऐ खुदा कुछ पुरानी चिठ्ठिया मिली मुझको
उस घर से जिसे नीलाम आज कर आया।
अशांत
नीलाम ऐ मोहब्बत

– अशान्त
– Ashant
अशान्त की चिट्ठी
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Comments
One response to “नीलाम ऐ मोहब्बत”
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i would like to start writing by focussing on the last line of previous comment coz this one exceptionaly good….agar main tumse maang sakun to chahungi ki tumhara ye hunur mere dard ko bhi in shabdo ki zabani keh sake
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