ज़िन्दगी और क्या है
मौत का सफर ही तो है
ज़िन्दगी और क्या है
एक घुपा हुआ नश्तर ही तो है
ज़िन्दगी और क्या है
एक टूटी आरजू ही तो है
ज़िन्दगी और क्या है एक लडखडाती लौ ही तो है
ज़िन्दगी और क्या है —-
सपना अकेले कोई देखता नही
आरजू तो जोड़े में चला करती है
नसीहत ज़माना देते थकता नही
उनको जो न ज़मीन पर चला करते हैं
इन्सान बदल सकता है जिस पर उसका बस होता है
उन चीज़ों का क्या जिन पर न किसी का बस होता है।
ज़िन्दगी और क्या है ——–
एक लौ आख़िर कब तक लडेगी
वक्त के साथ और कमज़ोर पड़ेगी
बत्ती हिम्मत की आख़िर कब तक जलेगी
मोम मासून सी आख़िर कबत तक न पिघलेगी
इतने पतंगों को जलाया है ‘जालिम’ ने
उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी!
ज़िन्दगी और क्या है
मौत तक का सफर ही तो है—–
अशांत

Leave a Reply