मैं तुमसे क्या मांग सकता हूँ?
क्या माँगना स्वाभिमान है?
एक मध्य-वर्गीय शोषित हूँ मैं
मेरी हड्डियाँ नहीं गली हैं
मेरे पीठ-पेट नहीं हैं एक
मेरा कमरा किताबों से
फ़ोन कई छूटी कालों से
घर आशावान घरवालों से
जीवन सपनों की शैवालों से
पूरी तरह भरा है,
पर मेरा ह्रदय
मेरी आत्मा
मेरा मन, सब खाली है!
नितांत एकांत का सन्नाटा
जहाँ मुझे कोई नहीं पहचानता,
मैं, स्वयं भी नहीं।
क्या माँगना स्वाभिमान है?
एक मध्य-वर्गीय शोषित हूँ मैं
मेरी हड्डियाँ नहीं गली हैं
मेरे पीठ-पेट नहीं हैं एक
मेरा कमरा किताबों से
फ़ोन कई छूटी कालों से
घर आशावान घरवालों से
जीवन सपनों की शैवालों से
पूरी तरह भरा है,
पर मेरा ह्रदय
मेरी आत्मा
मेरा मन, सब खाली है!
नितांत एकांत का सन्नाटा
जहाँ मुझे कोई नहीं पहचानता,
मैं, स्वयं भी नहीं।
इस सूखे में जीवन मुश्किल है
किताबों की कालिख ने सब ढक दिया है
अपना कुछ भी नहीं है
सब कुछ किसी न किसी “वाद” में ढका है
मेरे चश्मे से कुछ दिखाई नहीं देता;
मैं जो चल कर पहुँचता हूँ तुम्हारे पास
मात्र अंदाज़ा है ना कि
मनुष्य की कोई विशिष्ट क्षमता!
अब जो पहुँचा हूँ तुम्हारे पास
क्या दे सकते हो तुम?
घबराओ नहीं
कुछ बड़ा नहीं चाहिये
दे सको तो दे दो कभी न सूखने वाली
प्रेम की दो बूँद,
बहुत प्यास लगी है, और अब
पानी बहुत महँगा है
वो प्यास नहीं बुझाता
बस कलेजा जलाता है।
मैं तुमसे क्या मांग सकता हूँ?
क्या दे सकते हो मुझे तुम?
– प्रशान्त

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