अगर निभा सकिये तो मोहब्बत ज़रूर कीजिये
और अगर न हो बस में तो तौबा हुज़ूर कीजिये
अगर है जुर्रत तो ये इम्तिहान ज़रूर दीजिये
और अगर न हो बस में तो तौबा हुज़ूर कीजिये।
ये वो तालीम जो मुकम्मल नही नतीजों से
ये दिखती पूरी ख्यालों के दरीचे से
नाप लो इसको ये ऐसा इल्म नहीं
इतनी गहरी है मिलती जल्दी ज़मीन नहीं।
इसके पन्नों पर लफ्ज़ हजारों हैं
इसके पन्नों पर किस्से हजारों हैं
पर जो आसानी से समझ आए
ये वैसी है कोई किताब नहीं।
और कुछ चमकदार हो न हो
इसकी निशानी होती सुर्ख है
एक ऐसा तजुर्बा है ज़िन्दगी का
जिसमे चेहरा या आँखें होती सुर्ख है।
अशांत

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